बन्द करो ये नाटक राखी का…

By अजय एहसास

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बहन से कलाई पर राखी तो बँधवा ली, 500 रू देकर रक्षा का वचन भी दे डाला। राखी गुजरी, और धागा भी टूट गया, इसी के साथ बहन शब्द का मतलब भी पीछे छूट गया। फिर वही चौराहों पर महफिल सजने लगी, लड़की दिखते ही सीटी फिर बजने लगी… रक्षा बंधन पर आपकी बहन को दिया हुआ वचन, आज सीटियों की आवाज में तब्दील हो गया। रक्षाबंधन का ये पावन त्यौहार, भरे बाजार में आज जलील हो गया… पर जवानी के इस आलम में, एक बात तुम्हें ना याद रही। वो भी तो किसी की बहन होगी जिस पर छीटाकशी तूने करी… बहन तेरी भी है, चौराहे पर भी जाती है, सीटी की आवाज उसके कानों में भी आती है! क्या वो सीटी तुझसे सहन होगी, जिसकी मंजिल तेरी अपनी ही बहन होगी?

अगर जवाब तेरा हाँ है, तो सुन, चौराहे पर तुझे बुलावा है। फिर कैसी राखी, कैसा प्यार सब कुछ बस एक छलावा है… बन्द करो ये नाटक राखी का, जब सोच ही तुम्हारी खोटी है। हर लड़की को इज़्ज़त दो, यही रक्षाबंधन की कसौटी है।

अजय एहसास

युवा कवि और लेखक, अजय एहसास उत्तर प्रदेश राज्य के अम्बेडकर नगर जिले के ग्रामीण क्षेत्र सलेमपुर से संबंधित हैं। यहाँ एक छोटे से गांव में इनका जन्म हुआ, इनकी इण्टरमीडिएट तक की शिक्षा इनके गृह जनपद के विद्यालयों में हुई तत्पश्चात् साकेत महाविद्यालय अयोध्या फैजाबाद से इन्होंने स्नातक की उपाधि प्राप्त की। बचपन से साहित्य में रुचि रखने के कारण स्नातक की पढ़ाई के बाद इन्होंने ढेर सारी साहित्यिक रचनाएँ की जो तमाम पत्र पत्रिकाओं और बेब पोर्टलो पर प्रकाशित हुई। इनकी रचनाएँ बहुत ही सरल और साहित्यिक होती है। इनकी रचनाएँ श्रृंगार, करुण, वीर रस से ओतप्रोत होने के साथ ही प्रेरणादायी एवं सामाजिक सरोकार रखने वाली भी होती है। रचनाओं में हिन्दी और उर्दू भाषा के मिले जुले शब्दों का प्रयोग करते हैं।‘एहसास’ उपनाम से रचना करते है।

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