सियासी खिचड़ी पकाइए और पतंग की पेंच लड़ाइए

By प्रभुनाथ शुक्ल

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Makar Sankranti

मकर संक्रांति पर नत्थन गुरु का मिजाज बदला-बदला दिख रहा है। भगवान सूर्य मकर राशि में इसी दिन प्रवेश करते हैं। नत्थन गुरु संक्रांति यानी खिचड़ी पर हर वर्ष गाँव – जवार के मित्रों को खिचड़ी भोज का न्योता भिजवाते हैं। लेकिन खिचड़ी भोज में आने के बाद भी नत्थन गुरु और दोस्तों के बीच खिचड़ी पक नहीं पाती। कभी चावल तो कभी दाल कच्ची रह जाती है। जिसकी वजह से खिचड़ी का स्वाद अधूरा रह जाता है।

बेचारे इस समस्या को लेकर काफी गंभीर और परेशान रहते हैं। लेकिन खिचड़ी तो खिचड़ी ठहरी। अब पकाने वाले का दोष रहता है या खिचड़ी का यह नत्थन गुरू के समझ में नहीं आयी। निशानेबाज ! आखिर खिचड़ी का मामला क्या है, वह पकती क्यों नहीं। जबकी खिचड़ी पकाने में देश का हर आदमी और पूरी सियासत जुटी है। अब क्या बताएं गजाधर चाचा !

हमारे देश में खिचड़ी का इतिहास बहुत पुराना है। खिचड़ी और राजनीति का चोली दामन का साथ है। यहां खिचड़ी सरकारों का इतिहास रहा है। लेकिन खिचड़ी सरकारें चल नहीं पाई। यहां तोदिन-रात सब अपनी-अपनी खिचड़ी पकाने में लगे रहते हैं। जिसकी खिचड़ी पक गई उसकी बात बन गयीं। सामने लोकसभा का चुनाव है।

सभी अपने-अपने तरीके से खिचड़ी पका रहे हैं। कोई धर्म की खिचड़ी पका रहा है तो कोई जात की। लोगों को खिचड़ी भोज में शामिल होने का न्योता भी दिया जा रहा है। गजाधर काका सबसे बड़ी मुश्किल है खिचड़ी पकाने की। क्योंकि खिचड़ी जल्दी पकती नहीं है। राजनीति में तो लोग जबरिया खिचड़ी पकाते हैं।

अब देखिए चुनाव करीब देख सत्ता और विपक्ष अपनी- अपनी खिचड़ी पकाने में जुटे हुए हैं। किसकी कितनी बढ़िया खिचड़ी पकती है यह वक्त बताएगा। एक समस्या और है खिचड़ी में सिर्फ चावल, आलू और दाल का ही अस्तित्व बचता है। सब्जी का तो कोई अस्तित्व नहीं बचता है। जबकी खिचड़ी में शामिल लोग चावल, आलू और दाल ही बनना चाहते हैं। यहीं बात सब्जियों को नागवार लगती है। जिसकी वजह से खिचड़ी पकते पकते रह जाती है। वैसे भी मकर संक्रांति और पतंगबाजी एक दूसरे के पूरक हैं।

प्रभुनाथ शुक्ल

लेखक वरिष्ठ पत्रकार, कवि और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। आपके लेख देश के विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित होते हैं। हिंदुस्तान, जनसंदेश टाइम्स और स्वतंत्र भारत अख़बार में बतौर ब्यूरो कार्यानुभव।

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